क्यों है शिया और सुन्नी के बीच मतभेद Differences between Shia and Sunni

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क्यों है शिया और सुन्नी के बीच मतभेद

दोनों मुसलमान कहलाते हैं…. मज़हब एक हैं…. दोनों पैगंबर मोहम्मद को मानते हैं…. दोनों सिर्फ अल्लाह के आगे झुकते और सजदा करते हैं ……नमाज़ भी दोनों पांच वक़्त की अदा करते हैं … दीन भी दोनों का ‘इस्लाम’ है। तो मियां फिर दिक्कत कहां हैं? क्यों शिया-सुन्नी में इतनी दूरियां हैं। क्यों नफरतों के बीज फूटते रहते हैं? जब दोनों के मज़हबी अमल एक ही क़ुरान पर आधारित हैं, तो फिर क्यों इसके बाद भी शिया और सुन्नी के बीच मतभेद उभरते हैं। आज हम इसी मतभेद के पीछे की वजह पर से पर्दा उठाने की कोशिश करेंगे।

 

यह मुद्दा इस लिए ख़ास है क्योंकि दुनिया में बहुत से इस्लामिक देश ऐसे है जहाँ पर एक ही धर्म के लोगों  के बीच में कटरता उनके अलग समुदाय होने की वजह से है। यह टकराव आज का नहीं बल्कि शियाओं और सुन्नियों के बीच यह  टकराव और नफरत का इतिहास सातवीं सदी से ही है। इसकी मुख्य वजह रही इस्लामिक पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु, 632 ईस्वी मे उनकी मृत्यु बाद ही शिया और सुन्नियों में फूट पड़ी। सारे मुस्लिम धर्म के लोग पैगंबर मोहम्मद को इस्लाम धर्म का संस्थापक मानते  है। परन्तु जब उनकी मृत्यु हुई तो बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर मतभेद शुरू हुआ कि अब इस्लाम का खलीफा कौन होगा। इसी बात को लेकर दोनों समुदाय अलग अलग बाँट गए। सुन्नियों का मानना था कि मोहम्मद साहब का उत्तराधिकार उनकी पत्नी के पिता और उनके करीबी दोस्त अबु बक्र को मिलना चाहिए। ये मानते थे कि इस्लाम का नेतृत्व अबु को ही करना चाहिए क्योंकि मुस्लिम समुदाय में उन्हें लेकर सहमति थी।

जबकि शियाओं का मानना था कि मोहम्मद साहब ने अपने कजन और दामाद हज़रत अली को उत्तराधिकार बनाया था। यह विवाद लंबे संघर्ष के रूप में तब्दील होता गया कि इस्लाम का उत्तराधिकारी कौन होगा। सुन्नियों का मानना था कि मुस्लिम नेताओं को उत्तराधिकारी उन्हें बनाना चाहिए जो योग्य है जबकि शियाओं का मानना था कि मोहम्मद साहब के खून से संबंध रखने वाले को यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए।

इसी विवाद के चलते अंत में अबू बक्र को खलीफा घोषित किया गया। इसके बाद उम्र और उस्मान को खलीफा बनाने के लिए चुना गया। और फिर चौथे नंबर पर बार आयी हज़रात अली साहब को खलीफा बनाने की।

अब इस चुनाव को लेकर भी विवाद रहा क्योंकि शिया मुस्लिम मोहम्मद साहब के बाद अपने खलीफा की गिनती में सबसे पहला नाम हज़रत साहब का ही शामिल करते है। और अपने प्रमुख नेता को खलीफा की बजाए इमाम का नाम देते हैं। वहीँ इसके विपरीत सुन्नी मुस्लिम हज़रात अली को चौथे खलीफ़ा के स्थान पर रखते और मानते हैं।

इस विवाद से पहले सभी इस्लाम के मान ने वाले मोहम्मद साहब को ही अपना पैगम्बर मानते हैं। इस बड़ी आबादी के बीच विवाद की मात्र वजह हज़रात अली को प्रमुख नेता बनाने की वजहसे शुरू हुआ था।

इन दोनों ने शिया और सुन्नी नाम का चुनाव भी अपने हिसाब से किया। सुन्नी शब्द ‘अहल अल-सुन्ना’ मतलब ‘लोगों की राह’ से आया है। इनका कहना है कि मोहम्मद ने जो सबक और आदतें सिखाईं उन्हीं को वे फॉलो करते हैं। कुरआन में जिन जिन पेगम्बरों का उल्लेख मिलता है उन सभी को मानते हैं पर वह मोहम्मद साहब को आखरी पैगम्बर मानते है। और उनके बाद आने वाले सभी खलीफाओं को पैगम्बर नहीं बल्कि कुदरत की कुछ ख़ास शख्सियत मानते हैं। शिया शब्द ‘शियत अली’ मतलब अली का खेमा से आया है। इनका मानना है कि इस मत का सीधा संबंध मोहम्मद के खून से है इस्लामिक नया साल मुहर्रम माह की पहली तारीख से शुरू हो चुका है, लेकिन इसके बाद भी मुस्लिम जश्न नहीं मनाते। मुहर्रम की दसवीं तारीख दुनिया भर के मुस्लिमों के लिए गम लेकर आती है।

मुहर्रम (हिजरी) का महीना इस्लामी इतिहास के ऐसे हिस्से की याद ताजा कर देता है, जो पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए मातम की वजह होता है। इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर मोहम्मद के नाती हजरत हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के कर्बला की जंग में शहीद हो गए थे। ये एक ऐसी जंग थी, जिसमें यजीद की हजारों की सेना के सामने हारना तय तो था। लेकिन इसके बाद भी हजरत इमाम हुसैन ने घुटने नहीं टेके और वह इस्लाम, अच्छाई व इंसानियत के लिए शहीद हो गए। इतिहास के अनुसार, यजीद ने हुसैन के छह माह और 18 माह के बेटे को भी मारने का हुक्म दिया। इसके बाद बच्चों पर तीरों की बारिश कर दी गई। इमाम हुसैन पर भी तलवार से वार किए गए। इस तरह से हजारों यजीदी सिपाहियों ने मिलकर इमाम हुसैन सहित 72 लोगों को शहीद कर दिया। इस घटना के बाद से ही मुसलमानों ने इस्लामी कलेंडर के नए साल में ख़ुशी मनाना छोड़ दिया। करीब 1400 साल बीतने के बाद मुस्लिम इस माह में ख़ुशी का जैसे शादी जैसे कार्यक्रम नहीं करते हैं। शिया और सुन्नी हुसैन की मौत का इल्जाम एक दूसरे पर लगाते है। यह भी एक वजह है जिस के शिया और सुन्नी एक दूसरे के दुश्मन हैं।

शिया इस्लाम की शुरुआत एक आंदोलन के रूप में इस्लामिक समुदाय के बीच खास रूप में शुरू हुआ था। आज की तारीख में ये अल्पसंख्यक हैं। प्यू रिसर्च के मुताबिक, दुनिया भर की मुस्लिम आबादी में शियाओं की तादाद 10 से 13 प्रतिशत तक है। 87 से 90 प्रतिशत सुन्नी हैं। प्यू ने पाया कि बहुसंख्यक शिया आबादी महज कुछ देशों में रहती है। ये देश हैं- ईरान, पाकिस्तान, इंडिया और इराक। ईरान की आबादी 77 मिलियन है और शियाओं की आबादी 96 पर्सेंट है। इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया की एक तिहाई शिया आबादी ईरान में रहती है।

दूसरी तरफ मिस्र, सऊदी अरब और जॉर्डन सुन्नी प्रभुत्व वाले देश हैं। दुनिया भर के इस्लामिक देशों में शियाओं और सुन्नियों के बीच नफरत खत्म नहीं हो रही है। हाल के वर्षों में शिया और सुन्नियों के बीच खूनी संघर्ष बढ़े हैं। इसे सीरिया, इराक और यमन में साफ तौर पर देखा जा सकता है। इस मामले में सांप्रदायिक टकराव को लेकर करीब 14 देश आपस में जूझ रहे हैं।

दोस्तों इस आर्टिकल से किसी धर्म या संगठन को ढेस पहुंचना नहीं बल्कि इतिहास में उल्लेक्ख्नीय बातों को दुनिया के सामने लाना है। दोस्तों आज के आर्टिकल के बारे में आप कुछ कहना चाहते हैं तो हमे कमेंट करें।



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